ख़त्म कर अपने जीवन का अध्याय,
चल पड़े है वो आज एक नई राह पर।
है जहाँ सिर्फ़ प्यार ही प्यार हर ओर
क्योंकि है उनकी संगिनी उनके संग।
रोते बिलखते हुए रिश्ते, बच्चे,
और पोतियों को छोड़ यहाँ,
निकल गए क्षितिज की तरफ़ इस बार
कभी न लौटने का वादा कर।
पाँच महीने भी नहीं हुए है
गए उनकी अर्धांगिनी को।
असहनीय अकेलापन खा गया
उस गिर जाने वाले वृक्ष को।
एक तरह से देखा जाए तो
सब कुछ हुआ अच्छा ही,
लेकिन ऐसी मौत के
वो हक़दार नहीं थे।
अकेलापन होता है भारी
एक उम्र गुज़र जाने के बाद।
बेमतलब लगती है ज़िन्दगी
अपने साथी के जाने के उपरांत।
मायूस हो गए थे वो
खो कर अपनी संगिनी को।
न समझ सका कोई
उनकी उस चुप्पी को।
दबी रह गई बातें उनके सीने में,
ले गए वो सारा दर्द, अकेलापन, मायूसी,
अपने संग बाँटने को अपनी
प्रिय सखी, शोभा के संग।
रह गए बच्चे यहां रोते बिलखते,
अकड़ न टूटी कुछ बच्चों की।
मौत के बाद भी बँटवारा हो रहा है
पिता के पैसे और मां के ज़ेवर का।
नातिन, पोतियां, दामाद
ख़ामोश खड़े होकर कोने में,
देखते रहे तमाशा सारा
न कुछ कर पाए वो इस बार
रिश्तों की वो माला पिरोया था
जिन मां बाप ने आख़िर में
वो भी रोए ऊपर से देख कर
अपने बेटे की हरकतें।
बरस पड़ीबनकर बारिश
उनकी आँखों के आँसू
अक्ल न ठिकाने आई
उस स्वार्थी बेटे की फिर भी।
छोड़ कर सब बंधन,
चल पड़े वो दोनों अपनी राह
थामे एक दूसरे का हाथ
कभी न छोड़ने का वादा कर।
"कर्म लौटेगा ही प्रियतमा"
कहा अपनी पत्नी से
और चल पड़े ताउम्र साथ रहने
उस भगवान के घर में।